सुल्तानपुर। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का इतिहास सिर्फ शौर्य और सियासत तक सीमित नहीं है,यहां की शैक्षिक विरासत बेहद पुरानी और गौरवशाली और बेहद समृद्ध रही है।मुगल काल के बाद जब अंग्रेजों ने भारत की बागडोर संभाली, तब शिक्षा के क्षेत्र में जो बड़े बदलाव हुए,उनका सीधा असर सुल्तानपुर में भी देखने को मिला. जिले में आधुनिक शिक्षा की शुरुआत पुनर्जागरण काल के बाद तेजी से हुई,जिसने यहां के सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदल कर रख दिया।
1862 में बना था पहला हाई स्कूल
सुल्तानपुर में पहली बार हाई स्कूल की स्थापना सन 1862 में की गई थी (वर्तमान में जीआईसी सुल्तानपुर)।यह वह दौर था जब शिक्षा का माध्यम सिर्फ एक भाषा तक सीमित नहीं था। इस स्कूल में हिंदी के साथ-साथ उर्दू,फारसी और अंग्रेजी में भी शिक्षा दी जाती थी।साल 1870 तक इस स्कूल में केवल 168 छात्र ही रजिस्टर्ड थे।धीरे-धीरे शिक्षा का विस्तार हुआ और 1874 में जगदीशपुर में पहला मिडिल स्कूल खुला,इसके बाद 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में हसनपुर,दोस्तपुर और सुल्तानपुर में तीन और मिडिल स्कूल स्थापित किए गए।
गजेटियर के आंकड़ों में सुल्तानपुर की साक्षरता
सन 1903 के गजेटियर के आंकड़े बताते हैं कि उस समय सुल्तानपुर में प्राइमरी स्कूलों का जाल फैल चुका था।पूरे जिले में 162 प्राइमरी स्कूल थे।अगर क्षेत्रवार देखें तो सदर सुल्तानपुर में सबसे अधिक 52 स्कूल थे,कादीपुर में 36, अमेठी में 33 और मुसाफिरखाना में 12 स्कूल संचालित थे। उस समय पूरे जिले में कुल 4616 छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे,जो उस दौर के हिसाब से एक महत्वपूर्ण संख्या मानी जाती है।
कोलकाता विश्वविद्यालय से था गहरा नाता
हैरानी की बात यह है कि उस जमाने में जिला मुख्यालय पर स्थित हाई स्कूल का सीधा संबंध कोलकाता विश्वविद्यालय से था।वहां प्रवेश परीक्षा का आयोजन भी कोलकाता यूनिवर्सिटी के मानकों के आधार पर कराया जाता था,इसके साथ ही निजी क्षेत्र में भी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मधुसूदन हाई स्कूल और छीटे पट्टी में चुन्नीलाल हाई स्कूल की स्थापना की गई थी, जिन्होंने माध्यमिक शिक्षा के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई।
डोनाल्ड बटलर की किताब में दर्ज है पुरानी परंपरा
प्रसिद्ध लेखक डोनाल्ड बटलर ने अपनी पुस्तक दक्षिण अवध और सुल्तानपुर कैंटोनमेंट में यहां की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का जिक्र किया है।बटलर के अनुसार पुराने समय में शिक्षा मुख्य रूप से विद्वान ब्राह्मणों तक ही सीमित थी।ताल्लुकेदार और जमींदार शिक्षकों को भूमि दान में दिया करते थे।छात्र सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्या मंदिरों में रहकर ज्ञान अर्जित करते थे।यही वह नींव थी,जिस पर आज के आधुनिक सुल्तानपुर की शैक्षणिक इमारत खड़ी है।