सांझ ढलते ही जब गोला,मांडू,दुलमी और चितरपुर के खेतों में ढोल-नगाड़ों की थाप और हो-हो की हांक गूंजने लगे,तो समझ लीजिए कि रामगढ़ के गांवों में पहरेदारी का वक्त हो गया। हाथ में जलती मशालें,छतों पर टकटकी लगाए लोग और खलिहानों में पसरी बेचैनी यह किसी पर्व की नहीं,बल्कि साल दर साल गहराते डर की तस्वीर है।स्थानीय रपटों में इसे अक्सर हाथियों का हमला कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है, पर हकीकत यह है कि झारखंड का राजकीय पशु आज अपने ही पुरखौती रास्तों पर अजनबी बना दिया गया है।गजराज ने बस्तियों की ओर रुख नहीं किया,बल्कि हमारी खुली खदानों, धधकते ईंट-भट्ठों और कोल-साइडिंग के शोर ने उनके पुश्तैनी गलियारों को लील लिया है।
बेजुबान दिशाहीन कैसे
छोटानागपुर के मुहाने पर रामगढ़ की बनावट ऐसी है,जहां जंगल,कोयला पट्टी और नदियां एक-दूसरे से उलझी हैं। गोला से कसमार होते हुए झालदा-पुरुलिया जाने वाला रास्ता सदियों से हाथियों का मौसमी डहर रहा है,लेकिन दामोदर और भैरवी की कछारों में पसरे ओबी (ओवरबर्डन) डंप और कल-कारखानों ने इस प्राकृतिक जोड़ को खंडहर बना दिया। जब हजारीबाग या दलमा की तरफ से झुंड निकलता है तो आगे जंगल का सिरा गायब मिलता है।दिशाहीन होकर यह बेजुबान कारवां सीधे किसानों के लहलहाते धान और मक्के के खेतों में उतरने को मजबूर हो जाता है।
दोनों भुक्तभोगी
यह जंग दोनों तरफ सिर्फ घाव छोड़ रही है।एक तरफ जहां छोटे और सीमांत किसान अपनी खून-पसीने की कमाई और आशियाना गंवाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ हाथियों के लिए भी यह सफर जानलेवा है।खेतों में खींची गई नंगी बिजली की तारें,11 केवी की झूलती लाइनें और बरकाकाना-मूरी रेलखंड पर दौड़ते पहिए हर साल कई हाथियों को असमय मौत की नींद सुला देते हैं।
जल - जंगल - जमीन ही अंतिम रास्ता
अगर रामगढ़ को इस अंतहीन टकराव से उबारना है, तो हमें जंगल बचाने की रस्म अदायगी से आगे बढ़कर सख्त जमीन-उपयोग नीति बनानी होगी। गोला-कसमार-पेटरवार के पारंपरिक गलियारे को कागजी नहीं,बल्कि धरातल पर कानूनी सुरक्षा दी जाए। एनएच और रेलवे विस्तार में अनिवार्य रूप से अंडरपास और कॉरिडोर पैच बनें, साथ ही ग्रामीण इलाकों में लटकते तारों की केबलिंग हो। जब तक हम धरती के इन मूल बाशिंदों को उनकी स्वाभाविक राह नहीं लौटाएंगे, तब तक रामगढ़ का यह द्वंद्व न इंसानों को चैन से सोने देगा, न हाथियों को।