विशेष बातचीत:मत्स्य निदेशालय की ऊंची उड़ान,मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर झारखंड,महिला मत्स्यपालकों के लिए रंगीन मछली पालन बना रोजगार का सशक्त जरिया

विशेष बातचीत:मत्स्य निदेशालय की ऊंची उड़ान,मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर झारखंड,महिला मत्स्यपालकों के लिए रंगीन मछली पालन बना रोजगार का सशक्त जरिया

03 Jun 2026 |  27

 



नवल किशोर सिंह 



रांची।मत्स्य उत्पादन में झारखंड आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।साल दर साल मछली के उत्पादन में वृद्धि हो रही है।मत्स्य पालन से काफी संख्या में पुरुष और महिलाएं जुड़ने लगे हैं।खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में मछली पालन रोजगार का एक सशक्त साधन बनता जा रहा है।ये बातें मत्स्य निदेशालय के निदेशक अमरेंद्र कुमार ने मंगलवार को पूर्वांचल सूर्य से विशेष बातचीत में कही।



मत्स्य निदेशक अमरेंद्र कुमार ने बताया कि गत वित्तीय वर्ष की तुलना में मछली उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में चार लाख दस हजार मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य के एवज में तीन लाख इक्यासी हजार छह सौ मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ। 



अमरेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड में पहली बार रंगीन मछलियों के उत्पादन की पहल की गई है,इसके तहत महिला मत्स्यजीवी सहयोग समितियां का गठन कर महिलाओं को रंगीन मछली पालन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि महिला स्वावलंबन को गति मिल सके। रंगीन मछली पालन महिलाओं के रोजगार सृजन का एक माध्यम बन रहा है। 



 अमरेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड सरकार मत्स्य कृषकों को स्वावलंबी बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।कोशिश की जा रही है कि राज्य मछली पालन में सरप्लस होने के साथ ही अन्य राज्यों को भी मछली निर्यात कर सके।फिलहाल झारखंड में मछली की खपत के अनुरूप उत्पादन होने लगा है। झारखंड अब अन्य सीमावर्ती  राज्यों (बिहार,उड़ीसा और पश्चिम बंगाल) को मछली निर्यात कर रहा है, यह सरकार की कारगर रणनीति का प्रतिफल है।



मत्स्य निदेशक अमरेंद्र कुमार ने बताया कि हम मछली उत्पादन के निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।पिछले वित्तीय वर्ष 25-26 में जबरदस्त सफलता मिली। लगभग चार लाख मीट्रिक टन का रिकॉर्ड उत्पादन मत्स्य किसानों ने किया। इस वर्ष लक्ष्य को बढ़ाकर 4 लाख 23 हजार मीट्रिक टन रखा गया है। लक्ष्य हासिल करने के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही है। मत्स्य कृषकों को विभिन्न योजनाओं से आच्छादित किया जा रहा है।



 अमरेंद्र कुमार ने बताया कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अभी तक जो भी कार्य हुए हैं वह संतोषप्रद रहे हैं। इसमें किसानों का भी सहयोग मिला है। 4500 केज प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत किसानों को दिया गया है, वैसे पूरे राज्य में 15 हजार केज किसानों को दिए गए हैं। 



अमरेंद्र कुमार ने बताया कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान की शुरुआत की गई है। इसके तहत भारत सरकार द्वारा झारखंड के 223 प्रखंड अंतर्गत 6822 ग्रामों के अनुसूचित जनजाति के कृषक,जो मछली पालन को रोजगार के रूप में अपनाना चाहते हैं, उनके लिए यह योजना वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2028-29 तक के लिए शुरू की गई है। अमरेंद्र कुमार ने बताया कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारत के जनजातीय बहुल ग्रामों तथा आकांक्षी प्रखंडों में जनजातीय समुदायों के बीच सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार करना है एवं जल कृषि के माध्यम से अनुसूचित जनजातीय मछुआरों और सामूहिक मत्स्य पालक समूह धारकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।योजना का मुख्य उद्देश्य मछली उत्पादन एवं उत्पादकता में गुणात्मक वृद्धि, मत्स्य प्रबंधन हेतु नवीनतम तकनीकी सहायता, आवश्यक आधुनिक आधारभूत संरचना का विकास, आधुनिकीकरण एवं शुद्धीकरण हेतु सहायता उपलब्ध कराना है।उन्होंने बताया कि धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत 90 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। मछली पालन के लिए जरूरी प्रशिक्षण के साथ ही 15 हजार का किट भी दिया जाता है।



अमरेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड के मत्स्य कृषकों को मोती पालन का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके तहत मत्स्य कृषक मछली उत्पादन के साथ-साथ मोती पालन के गुरु भी सीख रहे हैं। इससे उनकी आर्थिक समृद्धि बढ़ रही है। केंद्र सरकार द्वारा झारखंड के हजारीबाग जिला को मोती पालन के लिए कलस्टर सेंटर चयनित किया जाना गर्व की बात है। 



अमरेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड में पहली बार महिला मत्स्यजीवी समिति बनाई गई है,जिसके तहत महिलाओं को खास तौर पर रंगीन मछली पालन के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है।यह ट्रेनिंग उड़ीसा के सीफा केंद्रीय मीठे जल जीवपालन अनुसंधान संस्थान से दी जा रही है।रंगीन मछली पालन के लिए इक्वेरियम,ड्रम,हीटर,फिल्टर,मोटर,पाईप,नेट,प्लास्टिक टब,एफआरपी टैंक,हैंड नेट,पेपर स्टीक,दवा के साथ रंगीन मछली का वितरण किया गया है।



 अमरेंद्र कुमार ने बताया कि मत्स्य उत्पादन की वर्तमान स्थिति,मछुआरों द्वारा उपयोग की जा रही पारंपरिक मछली पकड़ने की तकनीक तथा भविष्य में उन्नत मत्स्य प्रौद्योगिकी के उपयोग की संभावनाओं के आकलन के लिए राज्य के जलाशयों में तीन दिनों तक क्षेत्रीय सर्वेक्षण किया गया। यह सर्वेक्षण केंद्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के वैज्ञानिक डॉक्टर श्रवण कुमार शर्मा के नेतृत्व में टीम ने किया।

सर्वेक्षण के लिए गेतलसूद,तेनुघाट,कांके,हटिया,मैथन एवं पंचेत जलाशयों का भ्रमण किया गया।भ्रमण के दौरान जलाशयों में उपलब्ध मत्स्य संसाधनों,मछली पकड़ने की वर्तमान पद्धति,उपयोग किए जा रहे मत्स्य जालों,नावों,मत्स्य शिकार की चुनौतियों तथा स्थानीय मछुआरों की प्रशिक्षण संबंधी आवश्यकताओं का अध्ययन किया गया।



अमरेंद्र कुमार ने बताया कि विभिन्न स्थलों पर मछुआरों,मत्स्य सहकारी समितियों तथा स्थानीय हितधारकों से चर्चा कर जलाशय आधारित मात्स्यिकी की व्यावहारिक समस्याओं और संभावित तकनीकी समाधानों की जानकारी प्राप्त की गई।सर्वेक्षण में यह पाया गया कि झारखंड के जलाशयों में मत्स्य उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएं उपलब्ध हैं,लेकिन उन्नत एवं वैज्ञानिक मत्स्य शिकार तकनीक, उपयुक्त मत्स्य जालों, सुरक्षित एवं ऊर्जा दक्ष नावों तथा आधुनिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है।


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