48 डिग्री अभी तो झांकी है,नौतपा का टॉर्चर बाकी है,बांदा बना आग की भट्टी

48 डिग्री अभी तो झांकी है,नौतपा का टॉर्चर बाकी है,बांदा बना आग की भट्टी

23 May 2026 |  8

 



बांदा।उत्तर प्रदेश का बांदा जिला मई 48.2°C डिग्री पारे के साथ विश्व के सबसे गर्म इलाकों में शामिल हो गया है।नौतपा शुरू होने से पहले ही बाजारों में सन्नाटा और सड़कों पर थर्मल लॉकडाउन जैसे हालात बन चुके हैं। शनिवार सुबह 9:30 बजे बांदा जिले के मुख्य बाजारों में सन्नाटा पसरना शुरू हो गया था।बाबूलाल चौराहा,महेश्‍वरी देवी मंदिया और पीली कोठी की सभी जगहों का हाल लगभग एक सा ही नजर आ रहा था।आम दिनों में दोपहर तक गुलजार रहने वाली दुकानों के शटर एक-एक कर बंद होना शुरू हो गए। लगभग 10 बजते-बजते पूरी सड़क पर एक अजीब सी खामोशी छा चुकी थी।बांदा के बाजारों की यह बंदी कोई प्रशासनिक लॉकडाउन नहीं है, बल्कि प्रकृति का वह थर्मल लॉकडाउन है,जिसने बांदा को मई में सबसे तपते हुए इंसानी ठिकानों में से एक बना दिया है।



बांदा की यह खौफनाक तपिश कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं,बल्कि प्रकृति का इंसानी लालच के मुंह पर मारा गया एक जोरदार तमाचा है



बुंदेलखंड के बांदा की यह खौफनाक तपिश कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं,बल्कि प्रकृति का इंसानी लालच के मुंह पर मारा गया एक जोरदार तमाचा है।विकास का चोला ओढ़कर जिस बर्बादी के लिए सभी अपनी छाती पीट रहे थे, उन्ही ने बांदा को आग की भट्टी में झोंक दिया है।चंद रुपयों के मुनाफे के लिए माफियाओं ने नदियों का जमकर खनन किया,पहाड़ियों को समतल कर दिया,जंगल का तो पूछिये ही मत।कभी छोटी-छोटी पहाड़ियों और जंगलों से घिरे रहने वाले बांदा में फिलहला हरियाली के नाम पर सिर्फ 3 फीसदी इलाका ही बचा है।बांदा की इस बर्बादी के लिए खनन माफिया से भी ज्‍यादा धृतराष्‍ट्र बन चुका प्रशासन और सियासी नेतृत्‍व जिम्‍मेदार है,जिसमें हंसते-खेलते बुंदेलखंड को एक ओपन-एयर फर्नेस में तब्दील कर दिया है।



बांदा में अभी बाकी है नौतपा का टॉर्चर



बांदा में भीषण गर्मी ने तबाही मचा दी है।तबाही का यह दौर यहीं नहीं रुकने वाला है। 25 मई से नौतपा लगेगा है। 9 दिन जब सूर्य पृथ्वी के सबसे पास होता है और रोहिणी नक्षत्र के कारण नौ दिनों तक ब्रह्मांड की सबसे भीषण आग सीधे जमीन पर बरसती है।जब नौतपा के बिना ही मई के तीसरे हफ्ते में बांदा 48.2°C पर उबल रहा है, तब यह सोचकर ही रूह कांप जाती है कि 25 मई के बाद बांदा का क्या हाल होगा।नौतपा के दौरान बांदा का पारा सारे पुराने रिकॉर्ड्स को ध्वस्त करते हुए 50°C के पार जा सकता है।यह महज़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस अंचल के इंसानों,मवेशियों और बची-कुची वनस्पति के लिए डेथ वारंट जैसा है,नौतपा में चलने वाली लू नहीं, बल्कि आसमान से बरसते अंगारे होंगे जो बांदा को पूरी तरह झुलसा कर रख देंगे।



पहले भी कई बार धधक चुका है बांदा का कई इलाका



जून 2019 में 49.2°C तक पारा पहुंच गया था।यह बांदा के इतिहास का झुलसन भरा सबसे भीषण दिन था।इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड ने मौसम वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया था।तपिश इतनी भयावह थी कि आसमान से उड़ते हुए पक्षी सीधे जमीन पर गिरकर दम तोड़ रहे थे और सड़कों का डामर पिघलने लगा था।



अप्रैल 2022 में थर्मल ब्लास्ट हुआ था।आमतौर पर मई और जून को सबसे गर्म माना जाता है,लेकिन अप्रैल 2022 में ही बांदा का तापमान 47.4°C पहुंच गया था।इस रिकॉर्ड ने साबित कर दिया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब गर्मियों का चक्र न सिर्फ समय से पहले शुरू हो रहा है, बल्कि शुरुआत में ही जानलेवा रूप अख्तियार कर रहा है।



अप्रैल 2026 में 75 साल पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त हो गया है। अप्रैल में बांदा का तापमान 47.6°C दर्ज किया गया, जिसने साल 1951 के बाद से पिछले 75 सालों का सबसे उच्चतम रिकॉर्ड तोड़ दिया।इसने चेतावनी दे दी थी कि आने वाला मई का महीना बांदा के लिए एक जलती हुई भट्टी लेकर आ रहा है।मई के तीसरे हफ्ते में बांदा ने 48.2°C का आंकड़ा छूकर विश्व की सबसे गर्म जगहों में अपनी जगह बना ली।जिले के कई कस्‍बों में लगातार कई दिनों से तापमान का 47°C से ऊपर बना हुआ है। यानी अब यह सामान्य हीटवेव नहीं, बल्कि एक जलवायु आपातकाल लागू हो चुका है।



पहले चुरू,फलोदी और जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी शहर देश में सबसे गर्म माने जाते थे,जहां पारा 48°C से 50°C तक जाता था.लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़ों को देखा जाए तो बांदा ने इन सभी मरुस्थलीय शहरों को पछाड़ दिया है।अब बांदा गर्मी के मामले में देश का नया ग्राउंड जीरो बन चुका है।



प्रकृति के चक्रव्यूह और पत्थरों के जाल में फंसा



बांदा की भौगोलिक स्थिति ही इसकी सबसे बड़ी प्राकृतिक कमजोरी है।बांदा कर्क रेखा के बेहद करीब स्थित है,इसके कारण मार्च के बाद सूर्य का उत्तरायन होते ही सूरज की किरणें इस क्षेत्र पर बिल्कुल सीधी और लंबवत पड़ती हैं, जिससे सौर विकिरण का घनत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।बांदा की जमीन के नीचे बेहद प्राचीन और कठोर ग्रेनाइट और नीस चट्टानों की मोटी परतें हैं।इन पत्थरों का थर्मल मास बहुत अधिक होता है। ये पत्थर दिनभर सूरज की भीषण गर्मी को अपने भीतर एक स्पंज की तरह सोखते रहते हैं और दिन के समय पूरे इलाके को आग की भट्टी की तरह तपा देते हैं।



रेगिस्तान की रेत तो सूर्यास्त के बाद तेजी से ठंडी हो जाती है, लेकिन बांदा के कठोर पत्थर दिन में सोखी गई गर्मी को रात के समय बेहद धीमी गति से बाहर निकालते हैं, जिससे रात का न्यूनतम तापमान भी 35°C के आस-पास बना रहता है।इस थर्मल रेडिएशन से लोगों को रात में भी पसीने से तर और बेचैन रहना पड़ता है।



बांदा जिला राजस्थान के थार मरुस्थल से उठने वाली सूखी और गर्म पछुआ हवाओं के सीधे रास्ते पर पड़ता है।बीच में कोई घना जंगल या ऊंचे पहाड़ न होने से ये मरुस्थलीय हवाएं (लू) सीधे बांदा में घुसती हैं।मई में ये हवाएं इतनी शुष्क होती हैं कि हवा की नमी को पूरी तरह सोख लेती हैं।



प्री-मानसून सीजन में बांदा के ऊपर आसमान पूरी तरह साफ रहता है और कोई सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ या चक्रवाती हवाओं का क्षेत्र नहीं बनता है।बादलों की गैरमौजूदगी के कारण सौर ऊर्जा बिना किसी रुकावट के सीधे जमीन को भेदती है, जिससे सतह का तापमान लगातार बढ़ता चला जाता है।



प्रशासन और प्रतिनिधियों ने मुश्किल को आपदा में बदला



पर्यावरण विज्ञान के मुताबिक किसी भी क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए 33 फीसदी वन होने चाहिए,लेकिन बांदा का वास्तविक ग्रीन कवर घटकर मात्र 3 फीसदी रह गया है।खेती के अंधाधुंध विस्तार,अवैध लकड़ी कटाई और तथाकथित विकास के नाम पर पिछले तीस सालों में इस जिले के वनों का क्रूरता के साथ कत्लेआम किया गया है,जिसका नतीजा अब सबके सामने है।



बुंदेलखंड की पहचान रहीं छोटी-छोटी हरी-भरी पहाड़ियों को माइनिंग माफियाओं ने डायनामाइट से उड़ाकर मलबे में बदल दिया है।यहां चलने वाले सैकड़ों स्टोन क्रशरों से उड़ने वाली बारीक धूल हवा में एक अदृश्य चादर बना देती है, जो स्थानीय स्तर पर माइक्रो-ग्रीनहाउस इफेक्ट पैदा करके गर्मी को वायुमंडल में ही बनाए रखती है।



बांदा की जीवनरेखा कही जाने वाली केन नदी और आस-पास बहने वाली यमुना नदी पोकलैंड मशीनों द्वारा किए गए अवैध रेत खनन के कारण लहूलुहान है।रेत नदी के लिए नमी को संजोने वाले स्पंज का काम करती थी।रेत गायब होने से नदी गर्मियों से पहले ही पूरी तरह सूख जाती है,जिससे आस-पास की मिट्टी की नमी समाप्त हो जाती है और जमीन दहकने लगती है।



शहरीकरण की अंधी दौड़ में बांदा और उसके आस-पास के कस्बों में बिना किसी प्लानिंग के कंक्रीट के मकानों और डामर की सड़कों का जाल बिछाया गया है।पेड़ और खुले मैदान न होने से यह कंक्रीट दिनभर की गर्मी को सोखकर रात में बाहर निकालता है,जिससे शहरी इलाकों का तापमान गांवों से 3-4°C ज्यादा रहता है।



बांदा और पूरे बुंदेलखंड को इस थर्मल नर्क में धकेलने के सबसे बड़े गुनहगार हमेशा यहां का कद्दावर सियासी नेतृत्व रहा है।सरकार किसी की भी हो,सांसद-विधायक किसी भी पार्टी के हों,सभी ने सिर्फ यहां का दोहन ही किया है।इतिहास गवाह है कि इस धरती से चुनकर जाने वाले सांसदों, विधायकों और मंत्रियों ने कभी भी बुंदेलखंड के विकास, इसके जल संरक्षण या इसकी हरियाली के बारे में नहीं सोचा, उनके लिए बुंदेलखंड कोई पूजनीय मातृभूमि नहीं, बल्कि एक दोहन करने वाली सिर्फ जमीन रह गई है।



राजस्थान के मरुस्थलीय शहरों की तुलना में बुंदेलखंड का बांदा जिला अब अधिक गर्म क्यों रहने लगा है



राजस्थान के चुरू,फलोदी या जैसलमेर जैसे शहर रेतीली भूमि पर स्थित हैं।रेत की यह विशेषता होती है कि वह जितनी तेजी से गर्म होती है,सूर्यास्त के बाद उतनी ही तेजी से अपनी ऊष्मा छोड़ देती है,जिससे वहां रातें अपेक्षाकृत ठंडी और सहनीय हो जाती हैं,इसके विपरीत बांदा की जमीन के नीचे कठोर ग्रेनाइट चट्टानें हैं,जो दिनभर की भीषण गर्मी को अपने अंदर सोख लेती हैं और रात में उसे बेहद धीमी गति से बाहर निकालती हैं, जिससे बांदा में रात का तापमान भी बहुत ऊंचा रहता है। साथ ही राजस्थान में हाल के वर्षों में इंदिरा गांधी नहर के कारण कुछ इलाकों में हरियाली बढ़ी है,इसके विपरीत बांदा के कद्दावर नेताओं और क्रेशर माफियाओं के सिंडिकेट ने यहां के जंगलों को काटकर और पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर प्राकृतिक ग्रीन कवर को मात्र 3 फीसदी पर समेट दिया है। यही वजह है कि बांदा प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों कारणों से राजस्थान को पछाड़कर देश का सबसे गर्म नरक बन गया है।



क्या बांदा के इस भीषण तापमान के पीछे केवल स्थानीय कारण हैं या इसमें वैश्विक जलवायु परिवर्तन की भी कोई भूमिका है



बांदा की इस भयावह स्थिति के लिए स्थानीय कुप्रबंधन और वैश्विक कारक दोनों ही समान रूप से जिम्मेदार हैं,जो आपस में मिलकर एक डेथ ट्रैप बना रहे हैं।वैश्विक स्तर पर साल 2025-2026 में प्रशांत महासागर में सक्रिय रहे खतरनाक अल नीनो के प्रभाव और लगातार बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के रिकॉर्ड्स ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान को बढ़ाया है।आईपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक बांदा जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान के कारण थार रेगिस्तान से आने वाली सूखी और गर्म पछुआ हवाएं (लू) अब और अधिक आक्रामक, लंबी और तीव्र हो गई हैं,लेकिन जब ये वैश्विक विनाशकारी कारक बांदा में दाखिल होते हैं, तो इन्हें रोकने के लिए यहां न तो जंगल बचे हैं और न ही नदियों में पानी। नेताओं द्वारा पोषित बालू और क्रेशर माफिया ने स्थानीय पारिस्थितिकी का जो क्रूर दोहन किया है,उसने वैश्विक जलवायु परिवर्तन के असर को बांदा में कई गुना ज्यादा मारक और जानलेवा बना दिया है।



बांदा में नदियों और जल स्रोतों के सूखने का यहां के स्थानीय तापमान पर क्या वैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है



नदियों और जलाशयों का सूखना किसी भी क्षेत्र के तापमान को सीधे तौर पर बढ़ाने का काम करता है।जब केन नदी जैसी बड़ी जलधाराएं और स्थानीय तालाब पूरी तरह सूख जाते हैं, तो हवा में होने वाला इवेपोरेटिव कूलिंग (वाष्पीकरण के कारण होने वाली ठंडक) का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है। मिट्टी में पानी न होने के कारण उसकी नमी शून्य हो जाती है।सूखी मिट्टी गीली मिट्टी की तुलना में कई गुना तेजी से गर्म होती है और हवा को और अधिक शुष्क बना देती है।केन नदी में राजनेताओं के संरक्षण में जो अंधाधुंध अवैध रेत खनन हुआ है, उसने नदी के उस स्पंज को ही खत्म कर दिया जो पानी और नमी को रोककर रखता था।नदी के मरुस्थल में तब्दील होने से पूरे क्षेत्र की हवा एक विशालकाय ब्लो-ड्रायर की तरह काम करने लगी है।पानी के अभाव में वनस्पति भी झुलस चुकी है,जिससे सौर विकिरण सीधे नग्न जमीन को भेदता है और तापमान को अनियंत्रित तरीके से बढ़ा देता है।


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