पत्थलगड़ा के ऐतिहासिक राजागढ़ भूमि पर अतिक्रमण,सिमटकर रह गई 20–25 डेसिमल में प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर 

पत्थलगड़ा के ऐतिहासिक राजागढ़ भूमि पर अतिक्रमण,सिमटकर रह गई 20–25 डेसिमल में प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर 

18 Mar 2026 |  15

 



पूर्वांचल सूर्य प्रतिनिधि



पत्थलगड़ा/चतरा।प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत ग्राम सिंघानी एवं ग्राम लेम्बोइया की सीमा पर स्थित राजागढ़ के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक भूखंड पर इन दिनों अतिक्रमण का गंभीर मामला सामने आया है।लगभग एक एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस भूमि पर कुछ लोगों द्वारा अवैध कब्जा कर लेने के कारण अब इसका अधिकांश हिस्सा सिमटकर मात्र 20–25 डेसिमल ही शेष रह गया है।



ग्रामीणों के अनुसार यह भूखंड ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।बताया जाता है कि लगभग 400–500 वर्ष पूर्व यहां किसी राजा का पक्का ईंट का मकान स्थित था।मकान के समीप एक कुआं भी हुआ करता था,जो उस समय यहां की उपयोगिता और महत्व को दर्शाता था।गांव में जब भी बारात आती थी,तो बाराती इसी स्थान पर ठहरकर विश्राम करते थे,जिससे यह स्थल सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र हुआ करता था।



ग्रामीणों ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व तक यहां पुराने भवन की दीवारों के अवशेष स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे,लेकिन समय के साथ-साथ और लगातार हो रहे अतिक्रमण के कारण अब केवल ईंटों की बुनियाद ही शेष रह गई है।बुजुर्गों के अनुसार उन्होंने अपने पूर्वजों से भी राजागढ़ के गौरवशाली इतिहास के बारे में सुना है।उनका कहना है कि यह स्थान कभी राजा के निवास का प्रमुख केंद्र था और आसपास का क्षेत्र भी काफी विकसित हुआ करता था।



ग्रामीणों ने यह भी बताया कि इस भूमि की कई बार सरकारी नापी कराई जा चुकी है,लेकिन इसके बावजूद अतिक्रमणकारियों द्वारा कब्जा नहीं हटाया गया है।स्थिति यह है कि धीरे-धीरे यह ऐतिहासिक धरोहर पूरी तरह समाप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस स्थल से यदि कभी कोई धातु या प्राचीन वस्तु मिलती है, तो लोग उसे अपने पास रखने के बजाय वहीं छोड़ देते हैं। इससे इस स्थान के प्रति उनकी आस्था और ऐतिहासिक महत्व का स्पष्ट संकेत मिलता है।वर्तमान में इस भूखंड के बचे हुए हिस्से पर एक इमली का पेड़ तथा बांस का झुरमुट मौजूद है, जो इस स्थल की पहचान को किसी तरह जीवित रखे हुए हैं। 



ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि राजागढ़ भूमि को शीघ्र अतिक्रमण मुक्त कराकर इसकी ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस महत्वपूर्ण धरोहर से परिचित हो सकें।


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