होलिका दहन अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का दिव्य प्रतीक है:संजय सर्राफ

होलिका दहन अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का दिव्य प्रतीक है:संजय सर्राफ

01 Mar 2026 |  16

 



रांची।विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पवित्र पर्व है।यह अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का दिव्य प्रतीक है। इस दिन संध्या समय विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है और भक्तजन अपने जीवन से नकारात्मकता, पाप और अहंकार को दूर करने का संकल्प लेते हैं।



इस वर्ष होली पर्व पर भद्रा एवं खग्रास चंद्र ग्रहण का दुर्लभ संयोग बन रहा है।फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च को शाम 5:18 बजे से हो रही है।होलिका दहन 2 मार्च को रात 12:50 बजे के बाद होगा,अगले दिन 4 मार्च को धुलेंडी पर रंगों का त्योहार मनाया जाएगा।



संजय सर्राफ ने कहा कि होलिका दहन की कथा का वर्णन श्रीमद् भागवत और अन्य पुराणों में मिलता है।हिरण्यकशिपु नामक अत्याचारी असुरराज ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था।उसका पुत्र भक्त प्रह्लाद भगवान श्रीहरि विष्णु का परम भक्त था। यह बात हिरण्यकशिपु को स्वीकार नहीं थी। उसने कई बार प्रह्लाद को मृत्यु के मुख में धकेलने का प्रयास किया,किंतु हर बार भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे।अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था) से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने को कहा,लेकिन भगवान के कृपा आगे होलिका को प्राप्त वरदान निष्फल हो गया।होलिका अग्नि में भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए।यही घटना होलिका दहन के रूप में आज भी मनाई जाती है।होलिका दहन को पापों के दहन और नव जीवन के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि हमारे भीतर जो भी नकारात्मक भाव जैसे क्रोध,ईर्ष्या,लोभ, अहंकार आदि हैं, उन्हें इस अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। 



संजय सर्राफ ने कहा कि अग्नि देवता को साक्षी मानकर जब हम होलिका की परिक्रमा करते हैं,तो यह हमारे आत्मशुद्धि का संकल्प होता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोग सूखी लकड़ियां और उपले अग्नि में अर्पित करते हैं,जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि की प्रार्थना का प्रतीक है।



संजय सर्राफ ने कहा कि होलिका दहन स्थल को शुद्ध करके वहां लकड़ियों या उपलों का ढेर सजायें।रोली,अक्षत,पुष्प, जल,गुड़,हल्दी,मूंग,गेहूं की बालियां आदि से पूजन करें।कच्चा सूत (मौली) होलिका के चारों ओर लपेटे।भक्तजन श्रद्धा से परिक्रमा करते हुए सुख-समृद्धि और संतानों की रक्षा हेतु कामना करें।होलिका की अग्नि की राख को माथे पर लगाएं। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।



संजय सर्राफ ने कहा कि होलिका दहन धार्मिक त्यौहार के साथ ही सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है।इस दिन लोग अपने मतभेद भुलाकर एक साथ एकत्रित होते हैं।गांवों और मोहल्लों में सामूहिक रूप से होलिका दहन किया जाता है, जिससे भाईचारा और एकता की भावना प्रबल होती है। यह पर्व हमें बताता है कि अहंकार का अंत निश्चित है।



संजय सर्राफ ने कहा कि हिरण्यकशिपु का अभिमान नष्ट हुआ और अंततः भगवान श्रीनृसिंह ने उसका वध कर धर्म की स्थापना की,होलिका दहन हमें सदैव विनम्रता,करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।होलिका दहन की ज्वाला केवल बाहर की लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान को भी भस्म करने का संकेत देती है। यदि हम इस पर्व को आत्ममंथन का अवसर समझें, तो इसका वास्तविक लाभ प्राप्त होगा।होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक दिव्य उत्सव है, जो हमें यह संदेश देता है कि धर्म की विजय निश्चित है और ईश्वर अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, सकारात्मकता और समाज में प्रेम-एकता स्थापित करने का संदेश देता है।


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