पत्रकारिता मिशन से इंप्रेशन तक का सफर और साख की चुनौती:जितेन्द्र ज्योतिषी 

पत्रकारिता मिशन से इंप्रेशन तक का सफर और साख की चुनौती:जितेन्द्र ज्योतिषी 

25 Jan 2026 |  19

 



आज मेरे जीवन के 54वें वर्ष और पत्रकारिता के सफर के 25वें बसंत के मिलन बिंदु का दिन है।इस अवसर पर मुझे उन तमाम मित्रों,साथियों और शुभचिंतकों,

अधिकारी-पदाधिकारियों,पुलिस प्रशासन सहित सभी का हृदय से आभार व्यक्त करना है,जिन्होंने अपनी शुभकामनाओं से मेरा उत्साहवर्धन किया,लेकिन इस व्यक्तिगत खुशी के बीच एक पत्रकार और संगठन का नेतृत्वकर्ता होने के नाते मेरा मन पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य को लेकर थोड़ा व्यथित भी है।



साथियों बीते तकरीबन ढाई दशक में हमने संचार माध्यमों को बदलते देखा है।एक समय था जब खबर की पुष्टि के लिए हम मीलों का सफर तय करते थे,लेकिन आज फॉरवर्ड और कॉपी-पेस्ट का दौर है।तकनीक ने पत्रकारिता का द्वार सबके लिए खोल दिया,जिससे इस क्षेत्र में एक विशाल भीड़ जमा हो गई है।जब भीड़़ बढ़़ती है तो अनुशासन की कमी होती है,तो सबसे पहले गुणवत्ता और मर्यादा की बलि चढ़ती है।आज गली-कूचों में माइक और कैमरा थामे लोग तो दिखते हैं, लेकिन उनमें पत्रकारिता के बुनियादी संस्कार—धैर्य, शोध और तटस्थता—की भारी कमी नजर आती है।



पत्रकारिता की गरिमा उसकी साख पर टिकी होती है।विडंबना यह है कि आज समाज हमें लोकतंत्र के सजग प्रहरी की बजाय सनसनी फैलाने वाले या पक्षपाती के रूप में देखने लगा है।आज खबर की गहराई से ज्यादा इस बात पर जोर है कि थंबनेल कितना भड़काऊ है।



यह दौर पीत पत्रकारिता का पुनर्जन्म



डिजिटल युग में येलो जर्नलिज्म ने नए स्वरूप में वापसी की है,जहां व्यक्तिगत हितों के लिए किसी के चरित्र हनन या भ्रामक सूचना फैलाने में संकोच नहीं किया जाता। संस्थागत दबावों और गिरते राजस्व ने भी पत्रकारों को मिशन से हटाकर मार्केट की कठपुतली बना दिया है।



झारखंड के संदर्भ में चुनौतियां



झारखंड जैसे राज्य में,जहां जल-जंगल-जमीन और जनसरोकार की लड़ाई प्रमुख है,वहां पत्रकारिता की भूमिका और भी संवेदनशील हो जाती है। हमारे ग्रामीण पत्रकार साथी आज भी विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे हैं,लेकिन भीड़ के इस दौर में उनकी असली मेहनत कहीं न कहीं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के शोर में छिप जाती है।झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन का अध्यक्ष होने के नाते मेरा सदैव प्रयास रहा है कि हम पत्रकारों के कल्याण के साथ-साथ उनके प्रशिक्षण और नैतिक मूल्यों पर भी काम करें,क्योंकि गरिमा किसी के मांगने से नहीं मिलती,यह आचरण से कमाई जाती है।हमें पुनः फैक्ट-चेकिंग (तथ्यों की जांच) की परंपरा को अनिवार्य बनाना होगा। पत्रकारों को स्वयं अपनी सीमाएं और मर्यादाएं तय करनी होंगी। केवल कैमरा उठा लेना पत्रकारिता नहीं है, सामाजिक सरोकारों और कानूनी बारीकियों की समझ भी उतनी ही जरूरी है।हमें फिर से सत्ता से सवाल पूछने और अंतिम व्यक्ति की आवाज बनने की हिम्मत जुटानी होगी।



25 वर्षों के इस सफर ने मुझे सिखाया है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो,एक छोटा सा दीया (सच्ची पत्रकारिता) अपनी जगह बना ही लेता है।भीड़ बढ़े तो बढ़े,लेकिन हमारी कलम की साख नहीं गिरनी चाहिए।मेरी इस यात्रा में साथ देने वाले सभी सहयोगियों का एक बार फिर आभार।आइए हम सब मिलकर पत्रकारिता की खोई हुई चमक और गरिमा को पुनर्स्थापित करने का संकल्प लें।



जितेंद्र ज्योतिषी अध्यक्ष झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन ब्यूरो प्रमुख, पूर्वांचल सूर्य, कोल्हान क्षेत्र


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