यूपी विधानसभा में खामोश हुई बसपा की आवाज,एकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का निधन,संसद में भी हो जाएगी जीरो:धनंजय सिंह 

यूपी विधानसभा में खामोश हुई बसपा की आवाज,एकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का निधन,संसद में भी हो जाएगी जीरो:धनंजय सिंह 

06 Aug 2026 |  10

 



लखनऊ।उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के एकलौते विधायक 55 वर्षीय उमा शंकर सिंह का बुधवार देर रात लंबी बिमारी के बाद निधन हो गया।उमा शंकर सिंह का निधन सिर्फ एक विधायक का निधन ही नहीं बल्कि पूर्वांचल की सियासत का एक ऐसा केंद्र भी समाप्त हो गया,जिसके इर्दगिर्द डेढ़ दशक से सियासत सिमटी हुई थी।उमाशंकर सिंह के निधन के साथ बसपा यूपी विधानसभा में जीरो हो गई।



2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा पूरे उत्तर प्रदेश में साफ हो गई, लेकिन बलिया के रसड़ा से जीतकर उमाशंकर सिंह विधानसभा पहुंचे थे।यह जीत केवल चुनावी नहीं थी,बल्कि यह उमाशंकर सिंह के व्यक्तिगत जनाधार का प्रमाण थी।

उमाशंकर सिंह के निधन के साथ बसपा यूपी विधानसभा में जीरो हो गई है।यूपी विधान परिषद में बसपा का कोई भी सदस्य नहीं।लोकसभा में पहले ही बसपा का कोई भी सांसद नहीं है और इस साल नंवबर में राज्यसभा में पार्टी के एकलौते सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल पूरा हो जाएगा।इसके बाद बसपा संसद में जीरो हो जाएगी।



बसपा की सियासी जमीन सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में मजबूत रही है।बसपा का सियासी उदय भी यूपी से हुआ था।मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं,इसके बाद भी 2022 के चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट ही जीत सकी थी,ये सीट बलिया की रसड़ा थी,जहां से उमाशंकर सिंह विधायक थे। कैंसर की लंबी बिमारी के बाद बुधवार देर शाम उमाशंकर सिंह का निधन हो गया है।उमाशंकर सिंह का निधन उनके परिवार के साथ-साथ बसपा के लिए भी बड़ा सियासी झटका है।



उमाशंकर सिंह की सियासी यात्रा इस बात का उदाहरण भी है कि उत्तर प्रदेश में केवल दल ही सब कुछ तय नहीं करते,कई बार व्यक्ति स्वयं एक संस्था बन जाता है।बसपा का संगठन कमजोर होता गया,लेकिन रसड़ा में उमाशंकर सिंह की पकड़ बनी रही।यही कारण थी कि भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड लहर और बसपा के लगातार कमजोर होते जनाधार के बावजूद उमाशंकर सिंह जीतकर विधायक बने थे,लेकिन अब उनके निधन के बाद विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया है।



2024 में यूपी विधान परिषद से बसपा बाहर है,क्योंकि बसपा के एकलौते विधान परिषद सदस्य भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल खत्म हो गया था,इसके बाद बसपा की विधान परिषद में वापसी नहीं हो सकी।अब यूपी विधानसभा में बसपा शून्य पर पहुंच गई है।यूपी विधानसभा में बसपा की आवाज उठाने वाला कोई नहीं रह गया,विधान परिषद में पहले ही बसपा की आवाज खामोश हो चुकी है और विधानसभा में भी बसपा की आवाज खामोश हो गई।



बसपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी।संसद में बसपा के एकलौते सदस्य रामजी गौतम हैं, जो राज्यसभा में हैं,उत्तर प्रदेश के 10 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म हो रहा है,इन 10 राज्यसभा सांसदों में भाजपा के 8, सपा और बसपा के एक-एक सांसद हैं,इनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है।

2026 में रिटायर होने वाले राज्यसभा सांसदों में बसपा से रामजी गौतम हैं,बसपा के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर रामजी गौतम फिलहाल बसपा के एकलौते राज्यसभा सांसद हैं,जो 2019 में भाजपा के समर्थन से सांसद चुने गए थे।रामजी गौतम नवंबर 2026 के रिटायर हो रहे हैं यानि उनका छह साल का कार्यकाल खत्म हो रहा है।रामजी गौतम का राज्यसभा टर्म पूरा होने के साथ ही बसपा संसद में जोरी हो जाएगी,इस तरह संसद में भी बसपा की आवाज खामोश हो जाएगी।



बसपा साढ़े तीन दशक के बाद यूपी की विधानसभा और विधान परिषद के बाद संसद के राज्यसभा में शून्य पर होगी,जहां पर बसपा का कोई भी सदस्य नहीं रह जाएगा। कांशीराम ने बसपा का गठन 1984 में किया,लेकिन राजनीतिक रूप से सफलता 1989 के चुनाव में मिली थी। साल 1989 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा के 13 विधायक जीते थे,जिसके दम पर राज्यसभा नहीं पहुंच सकती थी।हालांकि साल 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा के तीन सदस्य संसद पहुंचने में जरूर सफल रहे थे।



मायावती बिजनौर से जीती थीं और रामकिशन यादव आजमगढ़ से सांसद बने थे।इसके अलावा हरभजन लाखा पंजाब के फिल्लौर से सांसद बने थे।मायावती पहली बार 1985 में बिजनौर लोकसभा से चुनाव लड़ा था,लेकिन कांग्रेस की मीरा कुमार से हार गईं थीं।मायावती ने अपने जीवन का पहला चुनाव 1985 में लड़ा था,लेकिन इसी के बाद बिजनौर को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया।चार साल के बाद 1989 में जीतकर उसी बिजनौर सीट से सांसद पहुंचीं,उसके बाद से बसपा का संसद में कोई न कोई प्रतिनिधित्व जरूर रहा है,लेकिन नवंबर 2026 में पहली बार होगा जब बसपा का कोई सदस्य नहीं रह जाएगा।



1993 में बसपा ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।बसपा के 67 विधायक बने। 1991 के लोकसभा चुनाव में मायावती हार गई थीं तो कांशीराम इटावा से सांसद बने थे। विधानसभा में बसपा की स्थिति 1993 में मजबूत हुई तो कांशीराम ने मायावती को 1994 में राज्यसभा भेजा था। मायावती पहली बार 3 अप्रैल 1994 को राज्यसभा सदस्य चुनी गई थीं और वे 25 अक्टूबर 1996 तक राज्यसभा सदस्य रहीं।



उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। 1994 से लेकर अभी तक बसपा का कोई न कोई नेता जरूर संसद में बसपा की आवाज को उठाता रहा। 2014 में भले ही बसपा का कोई लोकसभा सांसद नहीं बन सका,लेकिन राज्यसभा में उसके नेता थे। रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म होने के बाद बसपा की आवाज संसद में पूरी तरह खामोश जाएगी।



2024 का लोकसभा चुनाव अगर किसी पार्टी के लिए सबसे अधिक निराशाजनक रहे तो वह बसपा थी।बसपा इस चुनाव में कोई भी सीट नहीं जीत पाई है,उसका वोट शेयर भी गिरकर 3.66 से 2.04 फीसदी रह गया है।इससे बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीनने का खतरा मंडरा रहा है,अगर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बसपा से छिना तो यह देश में दलितों की पार्टी मानी जाने वाली बसपा के लिए बड़ा खतरा होगा।



बसपा 18वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कोई सीट नहीं जीत पाई है।इस चुनाव में बसपा को केवल 2.04 फीसदी वोट ही मिले हैं।इस तरह बसपा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखने के पहले दो मानकों पर खरी नहीं उतरती है।तीसरा मानक है पार्टी को चार या उससे अधिक राज्यों में क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता हो,लेकिन बसपा इस मानक को पूरा नहीं करती है।

देश में 2019 के बाद से अब तक हुए चुनाव में बसपा ने केवल यूपी में इस मानक को पूरा किया है।यूपी में बसपा 2022 के विधानसभा चुनाव में 12.88 फीसदी वोट हासिल किया, 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा राज्य स्तरीय पार्टी के मानक को पूरा किया है।यूपी में बसपा ने 9.39 फीसदी वोट हासिल किया है,ऐसे में बसपा के लिए सियासी संकट गहरा गया है।


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