विजय शंकर नायक
झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था,जहां आदिवासी और भूमिहीन मजदूरों की आजीविका मुख्य रूप से कृषि और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है,वहां रोजगार की गारंटी न केवल एक योजना है,बल्कि जीवन का आधार है।कांग्रेस द्वारा 2005 में संसद से पारित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने लाखों मजदूरों को कानूनी रूप से 100 दिनों का रोजगार प्रदान कर उनकी गरिमा और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित की,लेकिन भाजपा सरकार की नई योजना वीबी-जी राम जी (वीबी-ग्राम रोजगार गारंटी मिशन), जो मूल रूप से मनरेगा का एक पुनर्नामकरण और संशोधित रूप है,मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला है।यह योजना सतही तौर पर रोजगार के अवसरों का वादा करती है, लेकिन वास्तव में यह मजदूरों की कानूनी सुरक्षा को छीनकर उन्हें सरकारी कृपा पर निर्भर बनाती है।
इस लेख में हम मनरेगा और वीबी-जी राम जी की तुलना करेंगे।साथ ही उन अनछुए पहलुओं को उजागर करेंगे जो भाजपा की नीतियों के पीछे छिपे दलित आदिवासी गरीब मजदुर विरोधी एजेंडे को उजागर करते हैं –जैसे फंडिंग में कटौती,आदिवासी समुदायों पर प्रभाव,भ्रष्टाचार के बहाने कानूनी अधिकारों का हनन और पर्यावरणीय न्याय की अनदेखी।कानूनी अधिकार बनाम सरकारी कृपा: मूल अंतरमनरेगा एक संवैधानिक कानून है, जो अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जुड़ा है। यह गरीब,भूमिहीन, आदिवासी,महिलाओं और दिव्यांग मजदूरों को 100 दिनों का अकुशल रोजगार गारंटी देता है।मजदूर खुद काम मांग सकता है और यदि 15 दिनों में काम न मिले तो बेरोजगारी भत्ता अनिवार्य है।
यह योजना न केवल रोजगार देती है,बल्कि मजदूरी का समयबद्ध भुगतान (डीबीटी के माध्यम से), कार्यस्थल पर सुविधाएं (जैसे पानी, छाया, चाइल्ड केयर) और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। झारखंड में मनरेगा ने लाखों आदिवासी परिवारों को पलायन से रोका है।एक अध्ययन के अनुसार 2010-2020 के बीच मनरेगा ने राज्य में ग्रामीण मजदूरी दरों को 20-30% तक बढ़ाया और सीजनल माइग्रेशन को 40% कम किया।इसके विपरीत भाजपा की वीबी-जी राम जी योजना, जो 2025 में पेश किए गए बिल पर आधारित है।मनरेगा को ओवरहॉल का नाम देकर उसकी आत्मा को कमजोर करती है। हालांकि यह 125 दिनों का रोजगार वादा करती है, लेकिन यह कानूनी गारंटी नहीं है – बल्कि एक मिशन मोड स्कीम है, जहां रोजगार अवसर पर निर्भर है।
इसमें कौशल विकास,स्वरोजगार और युवा उद्यमिता पर जोर है,जो बुजुर्ग,अशिक्षित और दिव्यांग मजदूरों को बाहर कर देता है। क्रिटिक्स का कहना है कि यह योजना मजदूरों को लाभार्थी बना देती है न कि अधिकारधारक। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इसे ग्रामीण रोजगार को मारने का षड्यंत्र बताया है, क्योंकि यह केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा मनरेगा को कमजोर करने का प्रयास है।फंडिंग कटौती और राज्य सरकारों पर बोझमूल चर्चा में अक्सर अनदेखा किया जाता है कि भाजपा सरकार ने मनरेगा के फंडिंग में लगातार कटौती की है।
UPA शासन में मनरेगा का बजट सालाना बढ़ता था, लेकिन भाजपा के कार्यकाल में यह घटता गया – 2024-25 में बजट में 20% की कटौती हुई। वीबी-जी राम जी बिल में 40% फंडिंग का बोझ राज्यों पर डाला गया है, जो झारखंड जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य के लिए घातक है।इससे राज्यों की स्वायत्तता कम होती है और केंद्र की मनमानी बढ़ती है। इसके अलावा मनरेगा में भुगतान की देरी पहले से ही एक समस्या है।झारखंड में लाखों मजदूरों को महीनों से मजदूरी नहीं मिली, जो भाजपा की केंद्रीय नीतियों का परिणाम है।
वीबी-जी राम जी इस समस्या को और गहरा सकती है, क्योंकि इसमें समयबद्ध भुगतान की सख्त गारंटी नहीं है।एक और अनछुआ पहलू है आदिवासी समुदायों पर प्रभाव। झारखंड में 26% आबादी आदिवासी है और मनरेगा ने पांचवीं अनुसूची के तहत उनके अधिकारों को मजबूत किया, जैसे वन अधिकार और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण,लेकिन वीबी-जी राम जी में सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल (सेंट्रल ग्रामीण रोजगार गारंटी काउंसिल) से ग्राम सभाओं की भूमिका कम हो जाती है, जो आदिवासी स्वशासन को कमजोर करता है। इससे वन क्षेत्रों में पर्यावरणीय कार्य (जैसे जल संरक्षण, वनीकरण) प्रभावित होंगे, जो क्लाइमेट चेंज के दौर में महत्वपूर्ण हैं।
मनरेगा ने झारखंड में 50,000 से अधिक जल संरक्षण प्रोजेक्ट्स बनाए, जो सूखे से लड़ाई में सहायक हैं। वीबी-जी राम जी में ऐसा फोकस नहीं दिखता।लोकतांत्रिक नियंत्रण और सामाजिक अंकेक्षण का हननमनरेगा में ग्राम सभा निर्णय लेती है।कार्य चयन,निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण से पारदर्शिता सुनिश्चित होती है। इससे मजदूरों की सामूहिक शक्ति बढ़ती है,लेकिन वीबी-जी राम जी में फैसले ऊपरी स्तर से होते हैं, जो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को खत्म करता है। भाजपा इसे करप्शन कम करने का बहाना देती है,लेकिन वास्तव में मनरेगा में भ्रष्टाचार के 10 लाख से अधिक शिकायतें ग्राम सभाओं के ऑडिट से ही सामने आईं।यह बदलाव मजदूरों को निष्क्रिय बना देता है और शासन को बाजार-उन्मुख बनाता है।आर्थिक,सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावमनरेगा ने झारखंड में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई (50% से अधिक वर्कर्स महिलाएं), पलायन रोका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया,लेकिन वीबी-जी राम जी का फोकस युवा और स्किल्ड पर है, जो महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगों को बाहर कर देता है।
आर्थिक रूप से मनरेगा ने रूरल वेजेस बढ़ाए, जबकि वीबी-जी राम जी में मजदूरी महंगाई से लिंक नहीं है। सामाजिक रूप से यह योजना असमानता बढ़ा सकती है, क्योंकि SHG और उद्यमिता सीमित वर्ग तक पहुंचती है। पर्यावरणीय रूप से मनरेगा के कार्य (जैसे मिट्टी संरक्षण) क्लाइमेट रेजिलिएंस बनाते हैं,जो वीबी-जी राम जी में अनुपस्थित है।राजनीतिक संदेश: अधिकारों पर वैचारिक हमलाभाजपा सरकार अधिकारों के बजाय प्रचारित अवसरों पर फोकस कर रही है,जो संविधान की आत्मा अनुच्छेद 243(M) और पांचवीं अनुसूची पर हमला है।
सोनिया गांधी जी ने इसे राजनीतिक फैंसी बताया,लेकिन भाजपा इसे डिफेंड करती है।यह मजदूर विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी है, क्योंकि यह कानूनी एंटाइटलमेंट्स को कमजोर करता है।स्पष्ट मांगेंमनरेगा को कमजोर न किया जाए। 200 दिनों का रोजगार गारंटी दें,मजदूरी महंगाई से लिंक करें, भुगतान देरी पर दंड।वीबी-जी राम जी को मनरेगा का विकल्प न बनाएं, बल्कि पूरक।आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को मजबूत करें,फंडिंग कटौती बंद करें,केंद्र 100% फंड दे,अंतिम चेतावनी मजदूरों को योजना नहीं अधिकार चाहिए।भाजपा की नीतियां यदि जारी रहीं तो यह न केवल रोजगार की, बल्कि संविधान की रक्षा की लड़ाई बनेगी। झारखंड के आदिवासी और मजदूर एकजुट होकर इस हमले का विरोध करें।
(लेखक: विजय शंकर नायक कांग्रेस नेता हैं)