कांशीराम किसके हैं,राहुल,अखिलेश,चंद्रशेखर,मायावती में मची है होड़

कांशीराम किसके हैं,राहुल,अखिलेश,चंद्रशेखर,मायावती में मची है होड़

02 Oct 2026 |  34

 



धनंजय सिंह।उत्तर भारत में दलितों के सियासी उत्थान के लिए सबसे बड़ा आंदोलनकर्ता कांशीराम को 9 अक्टूबर को पुण्यतिथि पर देश याद करेगा।देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होना है,ऐसे में कांशीराम की पुण्यतिथि पर कई बड़े कार्यक्रम और ज्यादातर सक्रिय राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से उन्हें अपने-अपने हिसाब से याद किया जाएगा।राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस,अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी,चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के बीच कांशीराम की राजनीतिक विरासत को अपनाने की होड़ मची है।ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कांशीराम कौन हैं और वह किसके हैं।कौन सा राजनीतिक दल कांशीराम के विचारों के सबसे करीब है।



देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस शायद पहली बार कांशीराम को इतना ज्यादा महत्व दे रही है।खासकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अपनी खोई हुई सियासी ताकत पाने के लिए कांशीराम के विचारों को लेकर काफी बातें कर रहे हैं। राहुल गांधी इन दिनों युवाओं में खासकर GEN-Z को अपने साथ जोड़ने के लिए देश के अलग-अलग शहरों में छात्रों की गूंज कार्यक्रम कर रहे हैं। राहुल गांधी इन कार्यक्रमों में दलितों के साथ आज भी हो रहे छूआछूत और भेदभाव की सामाजिक बुराइयों को प्रमुखता से उठा रहे हैं।इसके अलावा राहुल गांधी कांशीराम का चर्चित नारा जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी भागीदारी को 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से ही बार-बार दोहराते हुए नजर आते हैं।



दलित उत्थान आंदोलन के समय से ही जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी भागीदारी यह नारा सबसे पावरफुल नारा है,इसमें सीधे तौर पर पूरे समाज को संदेश देने की कोशिश है कि चंद लोग पूरे देश का फैसला नहीं कर सकते हैं।देश के जो भी संसाधन हों या राजनीतिक ताकत वहां संख्या के हिसाब से भागीदारी मिलनी चाहिए।वास्तव में देखें तो महात्मा गांधी की नजरों में भी लोकतंत्र का असली मतलब भी यही था। कांशीराम ने भी जीवन पर्यंत यही प्रयास किया कि गांव-समाज के सबसे ज्यादा दबे कुचले,अछूत इंसान को भी देश के हर विभाग में समान हिस्सेदारी मिले।राहुल गांधी उनकी जयंती (15 मार्च) से ठीक पहले उनको भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग उठा चुके हैं।



राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रभारी भी दलित समाज से आने वाले राजेंद्र पाल गौतम को ही बनाया है। कहानी बस इतनी ही नहीं है। 1990 में कांशीराम की ओर से जब ना केवल उत्तर प्रदेश,बल्कि,बिहार,पंजाब,हरियाणा,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,आंध्र प्रदेश,राजस्थान जैसे कई राज्यों में दलित उत्थान आंदोलन का प्रभाव दिखने लगा तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ।



खासकर उत्तर प्रदेश में पारंपरिक दलित वोटबैंक पूरी तरह से कांग्रेस से दूर होने लगा।दलित कांशीराम की बनाई पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के साथ जुड़ गया,जिस कांशीराम की पार्टी बीएसपी ने दलितों को कांग्रेस से दूर किया, 1996 में उसी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ गई।इस चुनाव में बीएसपी 296 सीटें तो कांग्रेस ने केवल 126 सीटों पर प्रत्याशी उतार पाई।



1996 के चुनाव में कांग्रेस ने पूरे उत्तर प्रदेश से उखड़ने की कहानी खुद ही लिख डाली।देश का सबसे बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी 277 सीटों से पूरी तरह नदारद हो गई।इन सीटों पर कांग्रेस के तमाम नेता और कार्यकर्ता अपनी सुविधा के अनुसार समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में चले गए।अब 2012 से बीएसपी लगातार तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी है। वोटबैंक 30 फीसदी से घटकर 9 फीसदी तक आ चुका है,ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी इस प्रयास में हैं कि कांशीराम के नाम के सहारे बीएसपी से दूर हुए दलित वोटबैंक को दोबारा से कांग्रेस के साथ लाया जाए।कांग्रेस दलितों के प्रबुद्ध लोगों को भी जोड़ती जा रही है।



साल 1993 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा संस्थापक कांशीराम ने गठबंधन में चुनाव लड़कर ओबीसी,दलित और मुसलमान को साथ लेकर एक नया राजनीतिक समीकरण तैयार किया था, लेकिन 2 जून 1995 को लखनऊ में गेस्ट हाऊस के भीतर मायावती पर सपा समर्थकों ने हमला किया और उनकी हत्या करने की कोशिश की,उसके बाद से यूपी के दलित पूरी तरह से सपा से दूर हो गए।मुलायम सिंह यादव ने भी कभी भी दलितों को अपने साथ जोड़ने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया।यहां तक कि मुलायम सिंह यादव की सरकारों में दलित महापुरुषों के नाम पर रखे गए जिलों और संस्थाओं के नाम तक बदल दिए गए।



अब हालात बदल चुके हैं।मायावती और बीएसपी के कमजोर होते ही मुलायम सिंह यादव के बेटे सपा मुखिया अखिलेश यादव लगातार कांशीराम से अपनी नजदीकी दर्शाने के प्रयास में नजर आ रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए सपा की ओर से उतारे गए बस में ना केवल कांशीराम बल्कि कई दलित महापुरुषों की तस्वीरें प्रमुखता से लगाई गई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव जातीय समीकरण का पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का फॉर्मूला लेकर आए,ये सफल भी रहा।अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा में 15 दलित उम्मीदवार उतारे, यहां तक कि सुरक्षित सीटों के अलावा कुछ सामान्य सीटों पर भी दलित प्रत्याशी उतारे,इसमें से आठ दलित सांसद जीतकर लोकसभा पहुंचे।



अब 2027 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव बड़े पैमाने पर दलितों को टिकट देने की तैयारी में हैं। लगभग 20 से ज्यादा सामान्य सीटों पर भी दलितों को प्रत्याशी बनाया जा सकता है।सपा कहती है कि कांशीराम बहुजन की बात करते थे,अखिलेश यादव के पीडीए में भी यही बात है।



नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने तो खुद को कांशीराम के करीब दिखाने के लिए अपनी पार्टी के नाम में ही उनके नाम को जोड़ लिया है। चंद्रशेखर यूपी में दलितों के नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं।यूपी और देश में जहां कहीं भी दलित उत्पीड़न के मामले सामने आते हैं वहां चद्रशेखर अपने समर्थकों के साथ पहुंच जाते हैं।हालांकि चंद्रशेखर कांशीराम से विपरीत आक्रामक राजनीति करते हैं।जहां कांशीराम अपने आंदोलन को बेहद सलीके,जागरूकता और कानून के दायरे में रखकर अपने आंदोलन को चलाते थे,वहीं चंद्रशेखर का संघर्ष बेहद आक्रामक और तुरंत रिजल्ट पाने वाले अंदाज में होता है।कांशीराम की पार्टी बीएसपी यूपी के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी कमजोर होने पर चंद्रशेखर वहां अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारते जा रहे हैं।अगले कुछ सालों में चंद्रशेखर का यह प्रयास कहां तक सफल होता है यह देखना होगा। फिलहाल बड़ी सफलता यही है कि बिना किसी बड़ी पार्टी से गठबंधन के चंद्रशेखर 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना से सांसदी का चुनाव जीते।



कांशीराम ने मायावती के कंधों पर अपनी बनाई पार्टी बीएसपी की जिम्मेदारी सौंपी थी।मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं, लेकिन 2012 के बाद से जैसे मायावती पूरी तरह से सेल में जा चुकी हैं। 2006 में कांशीराम के देहांत के बाद मायावती ने यूपी के अलावा देश के बाकी राज्यों में पार्टी के विस्तार के लिए कोई खास प्रयास नहीं किया। 2012 के बाद उत्तर प्रदेश में भी मायावती की पार्टी लगातार गर्त में जा रही है।आज हालय यह है कि यूपी विधानसभा और संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में बीएसपी के एक भी विधायक और सांसद नहीं हैं।



मायावती ने अपने घर से निकलना बंद कर दिया है। काडर बेस्ड बीएसपी के कार्यकर्ता पूरी तरह से मायूस नजर आते हैं। मायावती खुद ही कहती हैं कि उनके गुरु कांशीराम परिवारवाद के खिलाफ थे,इसके बाद भी मायावती कभी भतीजे आकाश आनंद को पार्टी की कमान सौंपने का प्रयास करती हैं तो कभी उन्हें बाहर कर देती हैं। बीएसपी से तमाम बड़े नेता या तो अलग हो गए या मायावती ने हीं उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।आज बीएसपी के सामने अपने अस्तित्व को बनाए रखने की चुनौती है।



ऐसे समय में भी मायावती पार्टी और परिवार के विवादों में उलझी हुई हैं।जनसभाओं से मायावती पूरी तरह दूर हैं। मायावती के इसी बर्ताव से जाटव को छोड़कर तमाम दलित बीएसपी से दूर हो चुके हैं। ना केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में इस बात को लेकर असमंजस है कि मायावती ना जाने कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी को कहां ले जाना चाहती हैं।



उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं,इसमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इनमें से 58 सीटें जीतीं,जबकि समाजवादी पार्टी ने 16. कांग्रेस दो और बीएसपी के जीते एक विधायक में एक भी दलित नहीं हैं।वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में 80 लोकसभा सीटों में से बीजेपी और समाजवादी पार्टी ने यूपी की 17 एससी रिजर्व सीटों में से आठ-आठ जीतीं, जबकि कांग्रेस ने एक जीती।


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